नई दिल्ली:  संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक पेश किया। इस दौरान रिजिजू ने विधेयक को लेकर विस्तार से जानकारी दी और इसके नए नाम का भी एलान किया। उन्होंने कहा, ‘हमने जो वक्फ (संशोधन) विधेयक पेश किया है, उसमें जेपीसी की कई सिफारिशें शामिल हैं, जिन्हें हमने स्वीकार कर लिया है और इस विधेयक में शामिल कर लिया है। यह कहना गलत है कि जेपीसी की सिफारिशें इस विधेयक में शामिल नहीं की गई हैं। इस विधेयक का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू नई संरचित प्रणाली है। वक्फ विधेयक का नाम बदलकर एकीकृत वक्फ प्रबंधन सशक्तीकरण, दक्षता और विकास (यूएमईईडी) विधेयक कर दिया गया है। इससे ‘उम्मीद’ की भावना जगेगी।’

इससे पहले रिजिजू ने कहा, ‘2013 में 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कुछ ऐसे कदम उठाए गए थे, जो आपके मन में सवाल खड़े करेंगे। 2013 में सिखों, हिंदुओं, पारसियों और अन्य लोग वक्फ बना सकते थे। यह बदलाव कांग्रेस ने 2013 में किया था। कांग्रेस ने बोर्ड को खास बनाया, शिया बोर्ड में सिर्फ शिया ही शामिल होंगे। एक धारा जोड़ी गई कि वक्फ का प्रभाव हर दूसरे कानून पर हावी होगा। यह धारा कैसे स्वीकार्य हो सकती है?’

‘प्रावधानों का किसी मस्जिद या धार्मिक स्थल के प्रबंधन से कोई लेना-देना नहीं’
रिजिजू ने कहा, ‘वक्फ बोर्ड के प्रावधानों का किसी मस्जिद, मंदिर या धार्मिक स्थल के प्रबंधन से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल संपत्ति प्रबंधन का मामला है… अगर कोई इस बुनियादी अंतर को समझने में विफल रहता है या जानबूझकर नहीं समझना चाहता है, तो मेरे पास इसका कोई समाधान नहीं है…।’

‘आप चुनाव हार गए, तो फिर क्या फायदा हुआ’
उन्होंने कहा, ‘2012-2013 में किए गए कामों के बारे में मैं बताना चाहता हूं कि चुनाव नजदीक थे और आचार संहिता लागू होने वाली थी। अप्रैल-मई 2014 में चुनाव हुए। 5 मार्च 2014 को यूपीए सरकार ने आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली 123 प्रमुख संपत्तियों को दिल्ली वक्फ बोर्ड को हस्तांतरित कर दिया। इसकी क्या जरूरत थी? चुनाव में बस कुछ ही दिन बचे थे। क्या आप इंतजार नहीं कर सकते थे? आपको लगा कि इससे आपको चुनाव जीतने में मदद मिलेगी, लेकिन आप चुनाव हार गए, तो फिर क्या फायदा हुआ? ऐसी हरकतों से वोट नहीं मिलते।’

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