दो वर्ष भारत भ्रमण करने के बाद 1893 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका और बाद में यूरोप गए. चार वर्ष के बाद 1897 में पश्चिम के देशों से भारत वापस आने के बाद उन्होंने भारतवासियों को साररूप में तीन बातें कहीं. पहली – “पश्चिम से हमें संगठन करना सीखना चाहिए.”
दूसरी – “हमें मनुष्य निर्माण करने की कोई पद्धति, तंत्र विकसित करना चाहिए.”
तीसरी – “सभी भारतवासियों को आने वाले कुछ वर्षों के किए अपने-अपने देवी-देवताओं को एक ओर रखकर केवल एक ही देवता की आराधना करनी चाहिए, और वह है अपनी भारतमाता.”
संघकार्य और संघ शाखा इन तीनों बातों का ही मूर्तरूप है.
